सोमवार, 11 दिसंबर 2017

या फिर हमें भी इक चराग़ लेने दो ...

फूलों की कैद से पराग लेने दो
इन तितलियों से कुछ सुराग लेने दो

इस दौड़ में कहीं पिछड़ न जाएं हम
मंजिल अभी है दूर भाग लेने दो

राजा हो रंक पेट तो सताएगा
उनको भी तो चूल्हे से आग लेने दो

नज़दीक वो कभी नज़र न आएंगे
सोए हुए हैं शेर जाग लेने दो

हम आस्तीन में छुपा के रख लेंगे
इस शहर में हमको भी नाग लेने दो 

या जुगनुओं को छोड़ दो यहाँ कुछ पल 
या फिर हमें भी इक चराग़ लेने दो  

सोमवार, 4 दिसंबर 2017

कहानी खोल के रख दी है कुछ मजबूत तालों ने ...

लहू का रंग है यकसाँ कहा शमशीर भालों ने
लगा डाली है फिर भी आग बस्ती के दलालों ने 

यकीनन दूर है मंज़िल मगर मैं ढूंढ ही लूंगा
झलक दिखलाई है मुझको अँधेरे में उजालों ने

वो लड़की है तो माँ के पेट में क्या ख़त्म हो जाए 
झुका डाली मेरी गर्दन कुछ ऐसे ही सवालों ने

अलग धर्मों के भूखे नौजवानों का था कुछ झगड़ा
खबर दंगों की झूठी छाप दी अख़बार वालों ने

हवा भी साथ बेशर्मी से इनका दे रही है अब
शहर के हुक्म से जंगल जला डाला मशालों ने

वो अपना था पराया था वो क्या कुछ ले के भागा है 
कहानी खोल के रख दी है कुछ मजबूत तालों ने 

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

रँग चुके हैं यहाँ सब तेरे रंग में ...

अपने मन मोहने सांवले रंग में
श्याम रँग दो हमें सांवरे रंग में

मैं ही अग्नि हूँ जल पृथ्वी वायु गगन
आत्मा है अजर सब मेरे रंग में

ओढ़ कर फिर बसंती सा चोला चलो
आज धरती को रँग दें नए रंग में

थर-थराते लबों पर सुलगती हंसी
आओ रँग दें तुम्हें इश्क के रंग में

आसमानी दुपट्टा छलकते नयन
सब ही मदहोश हैं मद भरे रंग में

रंग भगवे में रँगता हूँ दाड़ी तेरी
तुम भी चोटी को रँग दो हरे रंग में

जाम दो अब के दे दो ज़हर साकिया  
रँग चुके हैं यहाँ सब तेरे रंग में 

(तरही गज़ल - पंकज सुबीर जी के मुशायरे में लिखी, जो दिल के 
हमेशा करीब रहती है)  

सोमवार, 20 नवंबर 2017

हम तरक्की के सौपान चढ़ते रहे ...

हम बुज़ुर्गों के चरणों में झुकते रहे
पद प्रतिष्ठा के संजोग बनते रहे

वो समुंदर में डूबेंगे हर हाल में 
नाव कागज़ की ले के जो चलते रहे

इसलिए बढ़ गईं उनकी बदमाशियाँ
हम गुनाहों को बच्चों के ढकते रहे

आश्की और फकीरी खुदा का करम
डूब कर ज़िन्दगी में उभरते रहे

धूप बारिश हवा सब से महरूम हैं
फूल घर के ही अंदर जो खिलते रहे

साल के दो दिनों को मुक़र्रर किया
देश भक्ति के गीतों को सुनते रहे

दोस्तों की दुआओं में कुछ था असर 
हम तरक्की के सौपान चढ़ते रहे

सोमवार, 13 नवंबर 2017

ये कहानी भी सुनानी, है अभी तक गाँव में ...

बस वही मेरी निशानी, है अभी तक गाँव में
बोलता था जिसको नानी, है अभी तक गाँव में

खंडहरों में हो गई तब्दील पर अपनी तो है  
वो हवेली जो पुरानी, है अभी तक गाँव में

चाय तुलसी की, पराठे, मूफली गरमा गरम
धूप सर्दी की सुहानी, है अभी तक गाँव में

याद है घुँघरू का बजना रात के चोथे पहर
क्या चुड़ेलों की कहानी, है अभी तक गाँव में ?

लौट के आऊँ न आऊँ पर मुझे विश्वास है
जोश, मस्ती और जवानी, है अभी तक गाँव में

दूर रह के गाँव से इतने दिनों तक क्या किया   
ये कहानी भी सुनानी, है अभी तक गाँव में 

(तरही गज़ल - पंकज सुबीर जी के मुशायरे में लिखी, जो दिल के 
हमेशा करीब है)  

सोमवार, 6 नवंबर 2017

ज़िंदगी के गीत खुल के गाइए ...

जुगनुओं से यूँ न दिल बहलाइए
जा के पुडिया धूप की ले आइए

पोटली यादों की खुलती जाएगी
वक़्त की गलियों से मिलते जाइए

स्वाद बचपन का तुम्हें मिल जाएगा
फिर उसी ठेले पे रुक के खाइए

होंसला मजबूत होता जाएगा
इम्तिहानों से नहीं घबराइए

फूल, बादल, तितलियाँ सब हैं यहाँ
बेवजह किब्ला कभी मुस्काइए

सुर नहीं तो क्या हुआ मौका सही
जिंदगी के गीत खुल के गाइए

माँ सभी नखरे उठा सकती है फिर 
आप बच्चे बन के तो इठ्लाईए

मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

गुज़रे थे मेरे दिन भी कुछ माँ की इबादत में ...

लिक्खी है गज़ल ताज़ा खामोश इबारत में
दिन रात इसे रखना, होठों की हिफाज़त में

हंसती है कहीं पायल, रोते हैं कहीं घुँघरू
लटकी हैं कई यादें जालों सी इमारत में

तारीफ़ नहीं करते अब मुझपे नहीं मरते
आता है मज़ा उनको दिन रात शिकायत में

छलके थे उदासी में, निकले हैं ख़ुशी बन कर
उलझे ही रहे हम तो आँखों की सियासत में

हालांकी दिया तूने ज़्यादा ही ज़रुरत से
आता है मजा लेकिन बचपन की शरारत में

इस दौर के लोगों का कैसा है चलन देखो 
अपने ही सभी शामिल रिश्तों की तिजारत में

हर वक़्त मेरे सर पर रहमत सी बरसती है 
गुज़रे थे मेरे दिन भी कुछ माँ की इबादत में

सोमवार, 25 सितंबर 2017

माँ ...

पाँच साल ... क्या सच में पाँच साल हो गए माँ को गए ... नियति के नाम पे कई बार नाकाम कोशिश करता हूँ खुद को समझाने की ... बस एक यही पल था जिसको मैं सोच न सका था ... उस एक लम्हे के पीछे खड़ा हो कर, उस लम्हे को सोचना चाहूँ तो भी सोच नहीं पाता ... जड़ हो जाता हूँ ... माँ का रिश्ता शायद यही है ... तुम्हें हमेशा अपने आस-पास ही पाता हूँ ...  

ओले, बारिश, तीखी गर्मी, सर पर ठंडी छतरी माँ
जोश, उमंगें, हंसी, ठिठोली, चुस्ती, फुर्ती, मस्ती माँ

घर के बूढ़े, चुप से पापा, चाचा चाची, भैया मैं
जाने किस कच्चे धागे से, सब को जोड़े रखती माँ

ऊँच नीच या तू तू मैं मैं, अगर कभी जो हो जाती 
सब तो आपस में लड़ लेते, पर खुद से ही लड़ती माँ

दर्द, उदासी, दुखड़े मन के, चेहरे से सब पढ़ लेती
छू-मंतर कर देती झट से, उम्मीदों की गठरी माँ 

पतली दुबली जाने किस पल काया में चाबी भरती
सब सो जाते तब सोती, पर सबसे पहले उठती माँ

चिंतन मनन, नसीहत निश्चय, साहस निर्णय, कर्मठता 
पल-पल आशा संस्कार, जीवन में पोषित करती माँ

सोमवार, 18 सितंबर 2017

मिलते हैं मेरे जैसे, किरदार कथाओं में ...

बारूद की खुशबू है, दिन रात हवाओं में
देता है कोई छुप कर, तकरीर सभाओं में

इक याद भटकती है, इक रूह सिसकती है
घुंघरू से खनकते हैं, खामोश गुफाओं में

बादल तो नहीं गरजे, बूँदें भी नहीं आईं
कितना है असर देखो, आशिक की दुआओं में

चीज़ों से रसोई की, अम्मा जो बनाती थी
देखा है असर उनका, देखा जो दवाओं में

हे राम चले आओ, उद्धार करो सब का
कितनी हैं अहिल्याएं, कल-युग की शिलाओं में

जीना तो तेरे दम पर, मरना तो तेरी खातिर 
मिलते हैं मेरे जैसे, किरदार कथाओं में 

सोमवार, 11 सितंबर 2017

राधा के साथ मुरली-मनोहर चले गए ...

भुगतान हो गया तो निकल कर चले गए
नारे लगाने वाले अधिकतर चले गए

माँ बाप को निकाल के घर, खेत बेच कर
बेटे हिसाब कर के बराबर चले गए

सूखी सी पत्तियाँ तो कभी धूल के गुबार
खुशबू तुम्हारी आई तो पतझड़ चले गए

खिड़की से इक उदास नज़र ढूंढती रही
पगडंडियों से लौट के सब घर चले गए 

बच्चे थे तुम थीं और गुटर-गूं थी प्रेम की 
छज्जे से उड़ के सारे कबूतर चले गए

तुम क्या गए के प्रीत की सरगम चली गई 
राधा के साथ मुरली-मनोहर चले गए